जब माँ डांटती थी तो कोई चुपके से हंसता था
नादाँ था,बचपना था,बहुत गलतियाँ करता था,
चुलबला था, शैतान था बहुत मस्तियाँ करता था,
माँ का गुस्सा चरम पर पहुँचता और डांट पड़ती,
जब मेरी माँ डांटती थी तो कोई चुपके से हंसता था। ।
…वो ओर कोई नहीं पिता हुआ करता था। ।
-डाॅ राजमती पोखरना सुराना
जब मां डांटती थी तो कोई चुपके से हंसता था
वह और कोई नहीं वही तो पिता था
एक मुस्कुराहट उसकी हमारी जान में जान आ जाती थी
मां की डांट को हल्के में ले कर वही तो हमें प्यार से समझाया करता था कि मां को नाराज करना भगवान को नाराज करने के बराबर है इसलिए मां की बात मानना ही उसने हमें सिखाया ऐसे पिता पर क्यों ना हो हमें गर्व आज जब वह हमारे साथ नहीं पर आसपास अभी भी हैं अपने उन्हीं मूल्यों और संस्कारों के साथ।
-मधु खरे
जब माँ डाँटती थी तो कोई चुपके से हंसता था
वो कोई और नहीं बल्कि मेरे पिता होते थे
माँ की डाँट से मिले चोट पर मरहम का फाहा रखते थे
अकेले में बुला लाड़ जताया करते थे
गलतियों को सुधार नए सिरे से
काम करने की नसीहत दिया करते थे।।
-मंजू लता
जब मां डांटती थी, तो कोई चुपके से हंसता था
मन ही मन सोचता था, अनुशासन ऐसे आता है
गलती पर नहीं वह सुधार के लिए सब करती थी
दूर खड़ा कोई नहीं, वो उसका पापा ही होता था
-मुकेश भटनागर
जिंदगी तो एक रंगोली है।
खूबसूरत सफर है।
माँ के डाँटने पर तो
अपना ही चुपके से हँसेगा!!
-सर्वेश कुमार गुप्ता






