कला का प्रदर्शन होते ही
कलाकार की वास्तविकता दिख जाती है
उसके जोश में चार चाँद लग जाता हैं
कला में निखार आ जाता है
दोगुने उत्साह से वो अपने कला को पुर्ण लगन से
आगे बढ़ाता जाता है।
— Manju Lata
कला का प्रदर्शन होते ही,
स्थापित होता है कला क्षेत्र!
सौंदर्य, संस्कृति व सभ्यता
का अनंत अद्भुत प्रभाव!
— Kavita Prabha
कला का प्रदर्शन होते हैं
वजूद को नया आयाम मिलता है।
खिल उठती हृदय में दबी चाहत
सजती संस्कारों,संस्कृति की जगमगाहट।
— Kiran Pandey
मेरी कलम का सवाल
तुम क्यों पिरोती हो वर्णमाला,
शब्दों का ताना बाना बुनकर,
स्याही से मुझे हर पल रंगती हो,
नींदों में भी जागकर,
मुझमें ही उलझी रहती हो
मिलता क्या तुम्हें,
जो वक्त इतना मुझे देती हो तुम,
कभी मां सरस्वती को अर्पित कर,
मुझे मन ही मन पूजती हो तुम,
कभी कबीर, मीरा, रसखान,
कभी गुलजार, कभी अमृता प्रीतम,
अतीत से आधुनिक पन्नों में मुझे ढूंढती हो तुम,
संजोकर सजाती हो मुझे अपने पास,
न मैं जीव हूँ ,न रिश्तों की डोर,
न कोई देश मेरा,न कोई मेरा धर्म,
न परिचय ,न अस्तित्व,
फिर भी मुश्किलों का हल पूछती हो तुम ?
क्यों तन्हाई में खुद को मुझसे साझा कर,
पलकें भीगी कर लेती हो तुम ?
मेरे नेत्रहीन पन्नों पर भी,
मौन संवेदनाओं से कैसे बोल लेती हो तुम ?
आलोचना चुपचाप सहकर
फिर भी,
कैसे मुझे दिल से थामें रहती हो तुम?
और मैं निशब्द हो जाती
क्योंकि मेरी कलम मौन नहीं
स्वतंत्र है स्वच्छंद है उन्मुक्त है
मेरे भाव की तरह,
अभिव्यक्ति बन कर
मुझे अलंकृत करती है
मेरा सफर तय करती है
हर दिन।
— Anshita Dubey
भाव से अभिव्यक्ति तक खुद को ले जाना
है एक चुनौती…
लेकिन जो जीत गया इस कोशिश में
वो कहलाया सिकन्दर
अभिव्यक्ति ही पहुँचाया उसको कामयाबी के मंजिल तक।
— Manju Lata
भाव से अभिव्यक्ति तक…….
मैंने हमेशा अच्छा सोचा अच्छा चाहा खुद के लिए,
दूसरों के लिए, ना किसी से कभी द्वेष रखा ना किसी से बेर रखा,
निस्वार्थ: प्रेम सबसे किया ना किसी को छला कपटा,
वक्त गुजरा, साल गुजरा, बचपन बीता, जवानी आयी,
अब वो अहसास ना रहे, वो जज्बात ना रहे, और अब वो मासूम ख़्यालात ना रहे,
दुनियाँ का असली चेहरा हमने तब देखा जब हम दर्द में थे और ये जमाना हम पर हँस रहा था,
वो लोग भी हमें अपने दुश्मन लगे जिनसे हमारा कोई वासता ना था,
फिर क्या था हम भी वक्त के साथ बेरहमों के लिए बेरहम हो गये,
जो छेड़ दे उसे छोड़ो ना ऐसे मेरे वसूल हो गये, ब्याज के साथ पाई – पाई के हिसाब के हम शौकदार हो गये,
बस अब यही हैँ हमारे भाव से अभिव्यक्ति
— Nilesh Gupta
भाव से अभिव्यक्ति तक
भंगिमाएं बदलती हैं क्षण क्षण।
सच्चाई छिपाए हिय कोटर,
मुख बोल ना पाए सच्चाई कह।
— Kiran Pandey
भाव से अभिव्यक्ति तक
सृजन की है अद्भुत प्रक्रिया
अनुभूति बन जाती अभिव्यक्ति
भाव भाव मिल बनती माला
तोड़ के बंधन निकसे अंकुर
अंकुर ही विकसित हो फूल
फूल सम भावों का प्रवाह
ही तो है मानस अभिव्यक्ति
है धन्य धन्य वह हर एक जन
अभिव्यक्त कर पाता जो मन
उमड़ उमड़ जब भाव ना निकसे
मन से ही ना कह पावे मन
रह जाये सब अनकही अनसुनी
अंतस् ही में रह जाये अंकुर
भाव ना हो पाए अभिव्यक्त
बिन अभिव्यक्ति बनता
मानव जीवन पशुवत्
अभिव्यक्ति का अधिकार
ही सच्ची आज़ादी है ।
अभिव्यक्ति ही कई बार
करवाती बर्बादी है
भाव का चयन कर जो करता अभिव्यक्ति
वही कहलाता सभ्य सामाजिक
व्यक्ति
— Nutan Kumar
भाव से अभिव्यक्ति तक।
इस जीवन से मृत्यु तक।।
हर क्षण में है वास प्रभु।
हो वंदन हर सांस प्रभु।।
— Poonam Deshwal
मन में उमड़ते भावों को
कागज पर उतारकर
अभिव्यक्ति करने से
बड़ा सुकून मिलता है।
— Anita Gupta
छोड़ती हैं दिन की राहें,
साँझ के दरवाजे हमको
रात की वीरानियों के बाद
फिर सुबह होनी ही है
भाव की है यह अभिव्यक्ति
— Sarvesh Kumar Gupta
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