World Poetry Month: Day 1

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World Poetry Month: Day One

World Poetry Month: Day 1
World Poetry Month: Day 1

Today marks the start of World Poetry Month, and we’re kicking off our celebration with a classic: William Wordsworth’s “I Wandered Lonely as a Cloud.”

This poem is an exploration of nature, and its beauty and power to move us emotionally.

As Wordsworth writes about his experience observing a field of daffodils, he captures a feeling of awe and wonder that is deeply resonant, even centuries later.

For today’s celebration, take some time to read “I Wandered Lonely as a Cloud” and reflect on your own experiences in nature.

Whether you’re exploring the outdoors or simply gazing out of your window, take a few minutes to appreciate the beauty around you and let it move you.

Happy World Poetry Month! Let’s get started.

“I Wandered Lonely as a Cloud” by William Wordsworth ▶️

I wandered lonely as a cloud
That floats on high o’er vales and hills,
When all at once I saw a crowd,
A host, of golden daffodils;
Beside the lake, beneath the trees,
Fluttering and dancing in the breeze.

Continuous as the stars that shine
And twinkle on the milky way,
They stretched in never-ending line
Along the margin of a bay:
Ten thousand saw I at a glance,
Tossing their heads in sprightly dance.

The waves beside them danced; but they
Out-did the sparkling waves in glee:
A poet could not but be gay,
In such a jocund company:
I gazed—and gazed—but little thought
What wealth the show to me had brought:

For oft, when on my couch I lie
In vacant or in pensive mood,
They flash upon that inward eye
Which is the bliss of solitude;
And then my heart with pleasure fills,
And dances with the daffodils.

Best Poetry Of The Day

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We believe that poetry has the power to move people and spark conversations. Our selection of poems comes from both established and emerging poets, each with their own unique style.

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6 Comments

  1. #rntalk
    #RNTPoetryChallenge
    #RNTnepowrimo

    मातृत्व
    —//—
    नन्ही चिड़िया तिनका तिनका ला घोंसला बना रही थी …
    तेज हवाएँ चलने लगी . मेघ गर्जने लगे,
    वो बेपरवाह सी सपनों की दुनिया बुने जा रही थी .
    ग़ज़ब की फुर्ती ,
    अज़ब सी ऊर्जा ,
    पंखों की फड़फड़ाहट बता रही थी ..
    नये आंगतुकों के स्वागत की है तैयारी ,
    नन्ही सी जान अब माँ बनने जा रही थी .
    चीं चीं के शोर से जतला रही ….
    माँ माँ होती है ,
    गर्भस्थ हो या हो नवजात ,
    कितना रखती ख़्याल है ,
    तिनके संग उसकी हर उड़ान ….
    मातृत्व को परिभाषित किये जा रही थी .

    बबीता
    १/४/२३

  2. #RNTPoetryChallenge
    #RNTnapowrimo

    बचपन

    मासूम था मेरा बचपन
    दुनियादारी से अन्जान
    प्यार की भूखी , मैं , पापा की लाडो ,
    अंगुली पकड़ परछाईं सी उनके संग चलती थी

    डगमगाती सी जब चलती मैं
    बाहें पसारे खड़े रहते हर मोड़ पर
    हर कदम को संवारते ,
    अंगुली पकड़ चलना सिखाते

    जीवन की ऊँच नीच पापा से ही जाना
    माँ थी अगर चाँदनी की शीतलता
    पापा थे तपिश से भरी कड़कती धूप
    जल – जलकर जीवन जीना सिखाया

    परिवार को संग ले चलना
    पापा से ही जाना
    बड़ी चतुराई लेकिन समर्पण भाव से
    परिवार की गाड़ी अकेले ही खींचते

    उनके आंसू किसी ने न देखा
    अपनी हर व्यथा बड़ी सफाई से छुपाए रखते
    माँ उनके हर आंसू के कतरे को
    अपने आंचल से थपकी देकर सुखाती

    आज मैं जिम्मेदारियों का बोझ लिए जीती हूँ
    पर हर जंग को हंसकर सह लेती हूँ
    जीवन में आए चाहे कितना ही तूफान
    पर हर तूफान पर परचम मैं ही लहराती हूँ

    याद करती हूँ जब भी वो सुनहरे दिन
    अनायास नजरें चली जाती हैं पापा के तस्वीर पर
    शुक्रिया कह अपना बचपन अपने बच्चों में देखती हूँ
    नई पीढ़ी को तूफानों से लड़ना सिखलाती रहती हूँ ।।

  3. #rntalks
    #RNTPoetryChallenge
    #RNTnapowrimo

    शीर्षक…..”बेटा — बेटी”

    अगर बेटा मेरा वारिस है
    तो ईश्वर का वरदान है बेटी
    बेटा तो है एक ही घर का चिराग
    दो कुलों की शान है बेटी ।

    पर आज का ये वहशी समाज
    लुट रही हर रोज यहाँ बेटियों की लाज
    हो रहा हर दिन एक न एक सीता का अपहरण
    जारी है अनवरत, द्रौपदी का चीरहरण।

    “कोख से कफन तक” नहीं हैं कहीं सुरक्षित बेटियाँ
    अपने ही जनक के हाथों, नित मरती हैं बेटियाँ ।

    देखकर ये दशा, काँपता है मेरा मन
    मैं भी हूँ एक स्त्री, माँगती हूँ प्रभु से ये वरदान
    देना मुझे भी बेटी की माँ बनने का सम्मान ।

    हे प्रभु! पिला देना उसे अमृत की दो बूँद
    फिर गढना वह अपरिपक्व भ्रूण
    कि चाह कर भी कोई कर ना पाए कन्या भ्रूण हत्या
    माँ की सुरक्षित कोख में मिले हर बेटी को जीवन नया ।

    हे ब्रह्मा! तू है सृष्टि कर्ता और मैं सृष्टि जननी
    मेरी ये अभिलाषा तुझे ही है पूरी करनी ।

    पोषित करुँ मैं अपना प्रतिरूप और दूँ उसे जीवन
    हे सृष्टि–कर्ता! माँगती हूँ तुझसे मैं यही वचन
    क्योंकि बेटा वारिस है तो
    वरदान है बेटी, अभिमान है बेटी ।।।।

  4. #RNTalks
    #RNTPoetryChallenge
    #RNTnapowrimo
    #Beingawoman
    ‘ जीवन यात्रा ‘

    जीवन की राह बड़ी अज़ब है
    कहीं कांटे हैं, कहीं फूल खिले l
    कभी कोई हमसे बिछड़ गया,
    किसी मग पर हैं अंजान मिले l
    अनजान बने अपने भी कभी,
    कभी अपने भी अंजान बने l
    लक्ष्य विमुख कभी हुई नहीं ,
    आगे बढ़ते रहने की ठानी है l
    रास्ते की बधाओं से तो,
    मेरी प्रीत पुरानी है l
    धैर्य विवेक के बल पर,
    जीवन की राह आसान हुई l
    इसीलिए तो अब मेरी भी,
    इस जग में अलग पहचान हुई l
    कभी घुटने नहीं टेके,
    कभी हिम्मत नहीं हारी l
    विपदाओं से टकराने की,
    जब भी आई मेरी बारी l
    स्वविवेक और आत्मबल वाले घोड़ों के रथ पर हो सवार l
    हो जाएगी ये जीवन यात्रा,
    बड़ी आसानी से पार l

  5. #RNTalks
    #RNTPoetryChallenge
    #RNTnapowrimo
    #Beingawoman
    ‘ जीवन यात्रा ‘

    जीवन की राह बड़ी अज़ब है
    कहीं कांटे हैं, कहीं फूल खिले l
    कभी कोई हमसे बिछड़ गया,
    किसी मग पर हैं अंजान मिले l
    अनजान बने अपने भी कभी,
    कभी अपने भी अंजान बने l
    लक्ष्य विमुख कभी हुई नहीं ,
    आगे बढ़ते रहने की ठानी है l
    रास्ते की बधाओं से तो,
    मेरी प्रीत पुरानी है l
    धैर्य विवेक के बल पर,
    जीवन की राह आसान हुई l
    इसीलिए तो अब मेरी भी,
    इस जग में अलग पहचान हुई l
    कभी घुटने नहीं टेके,
    कभी हिम्मत नहीं हारी l
    विपदाओं से टकराने की,
    जब भी आई मेरी बारी l
    स्वविवेक और आत्मबल वाले घोड़ों के रथ पर हो सवार l
    हो जाएगी ये जीवन यात्रा,
    बड़ी आसानी से पार l

  6. #rntalks
    #RNTPoetrychallenge
    #rntnapowrimo
    #day4

    गुलाब

    पुष्पों में पुष्प , अपार सुन्दरता सुगन्ध लिए
    चिरपरिचित गुलाब हूँ मैं

    सुन्दरियों के बालों का श्रृंगार हूँ
    बाग – बगीचों का शहंशाह हूँ मैं
    चाचा नेहरू का चहेता
    मैं विश्व प्रसिद्ध गुलाब हूँ

    प्रेम पहल का आगाज मुझसे ही होता है
    चाहे कैसी भी कठोर दिलवाली हो
    मेरी सुन्दरता में बावरी हो
    प्रेमी के बाहों में लोट – पोट हो जाती हैं

    कांटों के संग मेरा है पुराना याराना
    तालमेल उनके संग है खूब भाता
    उनके संग रहकर भी मुझमें कोई कमी न आती
    मेरी खुबियाँ दिन दूनी , रात चौगुनी बढ़ती ही रहती

    विविध रंगों में मैं पाया हूँ जाता ,लेकिन
    हर रंग अपने आप में ही नायाब तोहफा साबित होता है
    तितलियाँ , भौंरे , मधुमक्खियाँ सब खींचे चले आते हैं
    मेरे सुन्दरता में नहा खुद को धन्य पाते हैं

    किसी के गालों , होठों को जब छूता हूँ
    मन में तरंगें हिलोरें लेने लगती हैं
    मुझसे बने इत्र तो क्या राजा क्या रंक
    सभी का दिल छूते हैं

    मैं देवताओं के चरणों की शोभा हूँ
    सुहाग सेज भी मुझसे है सजता
    बड़े कान्फरेन्स हाल हो या जयमाल का मंडप
    सब मेरी ही तलब हैं रखते

    अपने किन – किन गुणों का
    बखान करूँ
    अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना मुझे भाता नही॔
    बस इतना ही जानता हूँ
    गुण खुशबू बन सारे जहाँ को खुद ही महकाते हैं

    पुष्पों में पुष्प , अपार सुन्दरता सुगन्ध लिए
    चिरपरिचित गुलाब हूँ मैं ।।

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